सेबी ने शेयरों में मेनिपुलेशन पर 18 लोगों को पूंजी बाजार में 3 साल तक कारोबार पर प्रतिबंध लगाया, दूसरे मामले में लायका लैब पर भी कार्रवाई

  • ग्रीनक्रेस्ट का शेयर अचानक स्पिलिट के बाद बढ़ गया
  • कंपनी कई लोगों को करोड़ो रुपयों का ट्रांसफर कर रही थी

दैनिक भास्कर

Jun 06, 2020, 09:21 PM IST

मुंबई. पूंजी बाजार नियामक सेबी ने शेयरों में मेनिपुलेशन के आरोप में 18 लोगों को तीन साल तक पूंजी बाजार में कारोबार करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही इन लोगों की म्यूचुअल फंड, इक्विटी बाजार और अन्य होल्डिंग को सीज कर दिया है। हालांकि आरोपियों में 2 लोग बच गए, क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला।

18 लोगों पर प्रतिबंध, दो लोग सबूत के आरोप में छूटे

सेबी ने शनिवार देर रात जारी एक सर्कूलर में यह ऑर्डर पास किया है। 63 पेज के अपने ऑर्डर में सेबी ने कहा है कि जिन लोगों पर प्रतिबंध लगाया गया है उसमें प्रेम लता नायर, श्याम व्यास, राज कुमार शर्मा, सरिता बिस्सा, पुष्पल चंद्रा, रविशंकर, संजोय कुमार चंद्रा, दिलीप कुमार मंडल, प्रीति कोठारी, सुनील पारेख, आदित्य पारेख, जेएमडी सोल्यूशंस, रविंद्र ग्रोवर का समावेश है।

ग्रीनक्रेस्ट फाइनेंशियल के शेयरों में चल रहा था मिलीभगत से खेल

सेबी ने ऑर्डर में कहा कि ग्रीनक्रेस्ट फाइनेंशियल सर्विसेस लिमिटेड के शेयरों में के कारोबार में ये लोग शामिल थे। इन लोगों ने 1 मार्च 2012 से 21 जुलाई 2015 तक नियमों का उल्लंघन किया। इसी समय कंपनी का शेयर बीएसई पर लिस्ट हुआ और इसमें दो प्रफरेंशियल अलॉटमेंट किए गए। पहला अलॉटमेंट 14 सितंबर 2012 को हुआ जिसमें 1,92,50,000 इक्विटी शेयरों को 12 रुपए प्रति शेयर पर 23.10 करोड़ रुपए में नॉन प्रमोटर को दिया गया। दूसरे अलॉटमेंट में 11 फरवरी 2013 को कंपनी ने 1,23,00,000 शेयरों को 12 रुपए प्रति शेयर पर 14.76 करोड़ रुपए में 45 नॉन प्रमोटर्स को दिया।  

प्रफरेंशियल शेयरों के अलॉटमेंट से हो रहे थे कारोबार

सेबी की जांच में पता चला कि दोनों प्रफरेंशियल शेयरों के अलॉटमेंट के समय इस कंपनी का शेयर 6.92 रुपए पर कारोबार कर रहा था। 10 मई 2013 से 4 जून 2014 तक और फिर 5 जून 2014 से 4 दिसंबर 2014 के बीच सेबी ने इस मामले की जांच की। पहली जांच में पता चला कि ग्रीनक्रेस्ट के शेयर में केवल 16 खरीदार थे और 15 बेचनेवाले थे। सेबी की जांच के अनुसार 10 मई 2013 को यह शेयर 7.26 रुपए पर एक्सचेंज पर खुला और उसमें केवल 132 कारोबार हुए। इस दौरान इसका भाव 4 जून 2014 को 264 रुपए चला गया।

कंपनी ने इसी बीच शेयरों का विभाजन या स्पिलिट किया

कंपनी ने 10-1 के अनुपात में 5 जून 2014 को स्टॉक का विभाजन किया। जिससे शेयरों के ट्रेडिंग वोल्युम में भारी वृद्धि देखी गई। यह भी जांच में पता चला कि स्टॉक स्पिलिट से पहले केवल 1,336 शेयर 133 ट्रेड में कारोबार किए गए। इस दौरान 10 मई 2013 और 4 जून 2014 के बाद 5 जून 2014 से 6 जून 2014 और 31 जुलाई 2015 को शेयर का वोल्यूम 5,41,48,981 हो गया और यह 53,590 ट्रेड में किया गया। शेयर की कीमत इसी दौरान शेयरों के विभाजन के बाद 26.90 रुपए से बढ़कर 69 रुपए हो गई। अगर इसे विभाजन के पहले के आधार पर देखें तो इसकी कीमत 698.50 रुपए प्रति शेयर होती है। यह कीमत 4 दिसंबर 2014 को थी।

कंपनी का सालाना रेवेन्यू केवल 80 लाख, फिर अचानक 10 करोड़

सेबी ने कहा कि जांच के दौरान पता चला कि कंपनी ने सालाना रेवेन्यू केवल 08.38 करोड़ और 10.30 करोड़ रुपए 2013-14 और 2014-15 के दौरान दिखाया। इसी तरह शुद्ध लाभ महज 70 लाख और 1.16 करोड़ रुपए रहा। इसका मार्केट कैपिटलाइजेशन 2,552 करोड़ रुपए रहा। सेबी ने पाया कि शेयर की कीमत और मार्केट कैपिटलाइजेशन फाइनेँशियल आंकड़ों को सपोर्ट नहीं कर रहा है।

सब आरोपी आपस में ही खरीद बेच रहे थे शेयर

कंपनी ने इस दौरान कोई अनाउंसमेंट भी नहीं किया। सेबी ने जांच के दौरान पाया कि कुछ आरोपी पहले अलॉटमेंट के दौरान कारोबार कर रहे थे। जबकि कुछ आरोपी दूसरे आरोपियों द्वारा खरीदे जानेवाले शेयर की बिक्री कर रहे थे । सेबी ने कहा कि जेएमडी सोल्यूशंस और पीएस आईटी इँफ्रा सर्विसेस गुलिस्तान आदि आपस में ही खरीद बेच रहे थे। जांच में पता चला कि यह सब आपस में कनेक्टेड थे।

ग्रीनक्रेस्ट ही सभी को फंड दे रही थी

जांच में पता चला कि कंपनी ग्रीनक्रेस्ट ही कुछ कंपनियों को फंड दे रही थी। इसके बाद यही कंपनियां प्रफरेंशियल के लिए खरीदी करती थीं। सेबी के मुताबिक कंपनी ने 2 करोड़ रुपए ग्लोबल इंफ्रा को एचडीएफसी के खाते से 13 सितंबर 2012 को ट्रांसफर किया था। इस फंड को पाने से पहले ग्लोबल के खाते में केवल 2.16 लाख रुपए बैलेंस थे। इसके बाद ग्लोबल ने 65 लाख रुपए दूसरे लोगों को ट्रांसफर किया। जबकि 1.35 करोड़ रुपए न्यूमेटिक लीजिंग को ट्रासंफर किया।

एनबीएफसी के रूप में स्थापित थी ग्रीनक्रेस्ट

इसी तरह न्यूमेटिक के डायरेक्टर को ग्रीनक्रेस्ट से 1.35 करो़ड़ मिला। यह फंड प्रफरेँशियल के लिए उपयोग में लाया गया। कंपनी में सुनील पारेख और आदित्य पारेख ईडी थे। सेबी ने जांच में पाया कि यह शेयरों का खेल पूरी तरह से मेनिपुलेशन था और इसमें सभी लोग शामिल थे। ग्रीनक्रेस्ट एक एनबीएफसी के रूप में स्थापित कंपनी थी।

लायका लैब पर भी तीन साल के लिए प्रतिबंध

एक दूसरे मामले में सेबी ने ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसिप्ट (जीडीआर) में नियमों का उल्लंघन करने के आरोपा में लायका लैब पर पूंजी बाजार में तीन साल तक कारोबार करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके साथ ही एक आरोपी को बरी कर दिया है। सेबी ने 28 पेज के ऑर्डर में यह जानकारी दी है। सेबी ने कहा कि लायका लैब ने एक नवंबर 2005 से 31 दिसंबर 2005 के बीच जीडीआर जारी किया था। इसमें दो बार जीडीआर जारी कर 0.80 मिलियन और 5 मिलियन डॉलर की राशि जुटाई थी।

निवेशकों को गुमराह किया कंपनी ने 

सेबी की जांच में पता चला कि लायका लैब ने इस दौरान जो डिस्क्लोजर किया, वह पूरी तरह से मिसलीडिंग था। इससे निवेशक बड़े पैमाने पर गुमराह हुए। सेबी ने अपने ऑर्डर में कहा कि लायका लैब ने 9 अगस्त 2005 को बैंक में जीडीआर के मकसद से खाता खोला था। इसमें इसके चेयरमैन एवं एमडी एन एल गांधी बैंक में साइनिंग अथॉरिटी थे। कंपनी ने रिजोल्यूशन पास कर कहा कि जीडीआर से जुटाई गई पूंजी का उपयोग लोन की सिक्योरिटी के लिए किया जाएगा। लेकिन बाद में यह पाया गया कि कंपनी ने निवेशकों को अंधेरे में रखकर इस पैसे का उपयोग कहीं और किया।