वित्त वर्ष 2021 में एक्सटर्नल सेक्टर के प्रति सावधान रहना चाहिए, लंबी मंदी रुपए को प्रभावित कर सकती है

  • 2008 का सब प्राइम संकट भी विकसित देशों की कमजोरी को अच्छी तरह से उजागर कर चुका है
  • सीमित संसाधनों के कारण कोई भी संकट उभरते बाजारों को बड़ी चुनौतियों के दलदल में ढकेल देता है

दैनिक भास्कर

Jun 08, 2020, 01:56 PM IST

मुंबई. वित्त वर्ष 2021 में अपने एक्सटर्नल सेक्टर के प्रति सचेत रहना चाहिए। क्योंकि लंबी मंदी एक्सटर्नल सेक्टर के मैट्रिक्स विशेष रूप से रुपए को प्रभावित कर सकती है। यह बात एसबीआई की रिपोर्ट में कही गई है।

तेल की कम कीमतों से करेंट अकाउंट सरप्लस बढ़ेगा

एसबीआई ने सोमवार को जारी रिपोर्ट में कहा कि वित्त वर्ष 2021 में हम मानते हैं कि भारत तेल की कम कीमतों के कारण चालू घाटा सरप्लस (current account surplus) प्राप्त करने जा रहा है। हालांकि यदि तेल की कीमतें अस्थिर रहती हैं और पर्याप्त समय तक 40 डॉलर प्रति बैरल से अधिक पर रहती हैं तो रिजल्ट कम हो सकता है।

वैश्विक जीडीपी गिरकर -3 प्रतिशत रह सकती है

रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) का अनुमान है कि 2020 में वैश्विक जीडीपी गिरकर -3 प्रतिशत हो सकती है। दुनिया कोविड में एक संकट देख रहा है जिसमें आर्थिक दृष्टि से तबाही सामने दिख रही है। हालांकि 2008 का सब प्राइम संकट भी विकसित देशों की कमजोरी को अच्छी तरह से उजागर कर चुका है। हकीकत यह है कि उभरते बाजारों के लिए कोई भी संकट बहुत बड़ी चुनौतियों के दलदल में ढकेल देता है। क्योंकि उन्हें सीमित संसाधनों के साथ घरेलू और साथ ही साथ बाहरी मोर्चे पर सामना करना पड़ता है।

एक्सटर्नल सेक्टर को दो तरह से देख सकते हैं

रिपोर्ट के अनुसार रेटिंग एजेंसियां अपने मैट्रिक्स को हॉक की तरह देखती हैं। निवेशक भी मैक्रो-इकोनॉमिक मापदंडों में किसी भी चूक के बारे में कोई समझौता नहीं करते हैं। भारत का बाहरी क्षेत्र (एक्सटर्नल सेक्टर) कोविड के बाद कैसा दिखेगा, यह देखने वाली बात होगी। इसे हम एशियाई संकट और वैश्विक वित्तीय संकट के बाद रुपए की दो asymmetric एक्शन से समझ सकते हैं। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में डॉलर की तुलना में रुपए में 20 प्रतिशत की गिरावट दिखी थी। लेकिन इसमें थोड़ा गैप था। विशेष रूप से संकट के बाद के कुछ वर्षों में गैर कर्ज पूंजी प्रवाह काफी (non debt capital flows) अचानक बढ़ गया था। इससे पोर्टफोलियो कैपिटल फ्लोज (portfolio capital flows) काफी हद तक कम हो गया था।

2011 में भारत ने आर्थिक चुनौतियों का सामना करना शुरू किया था

रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 के बाद जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गिरावट आई और भारत ने विकास की चुनौतियों का सामना करना शुरू कर दिया। भारत ने चालू खाते घाटे को कम करना शुरू किया। इससे पूंजी प्रवाह (कैपिटल फ्लो) का कम्पोजीशन विपरीत हो गया। हालांकि, कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण पिछले कुछ वर्षों में चालू खाता घाटा कम होने के कारण रुपया स्थिर हो गया। हालांकि, इस तरह के रुपए में गड़बड़ी के पीछे कैपिटल फ्लो और ग्रोथ मैट्रिक जैसे फैक्टर थे।

1997-98 के एशियाई संकट में रुपए में भारी उतार-चढ़ाव दिखा

इसी तरह 1997-98 एशियाई संकट सामने आया तो रुपए में भारी उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिला। क्योंकि हमारा चालू खाता घाटा काफी हद तक नियंत्रण में था। रिपोर्ट कहती है कि कोरोना के बाद रुपए का व्यवहार एक्सटर्नल सेक्टर की स्थिति पर निर्भर करेगा। 1997-98 संकट के दौरान, वित्त वर्ष 1997 की शुरुआत 4 वर्ष की अवधि के लिए शुद्ध पूंजी प्रवाह का औसत गैर कर्ज कंपोनेंट (average non debt component) 45 प्रतिशत था। इसमें कोई महत्वपूर्ण अस्थिरता नहीं थी। इसके विपरीत, वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की अवधि में फ्लो और नॉन डेब्ट कैपिटल फ्लो में काफी अस्थिरता देखी गई। इसका कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का निर्धारण करने वाले फैक्टर्स में महत्वपूर्ण रुकावट थी।

वित्त वर्ष 2014 में वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत हो गई थी

रिपोर्ट कहती है कि हालांकि इसके बाद वित्त वर्ष 2014 में यह वृद्धि 6.4 प्रतिशत तक हो गई और रुपए पर प्रभाव बाद में आया। हम अब इसी तरह की विकास चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 में 8.3 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2020 में 4.2 प्रतिशत हो गई है। केवल एक अच्छी बात यह है कि हमारी बाहरी कर्ज (एक्टसर्नल डेट) की स्थिति जून 2019 के अंत में जीडीपी के अनुपात के 19.8 प्रतिशत के एक्सटर्नल डेट के साथ टिकाऊ है। 

एशियन फाइनेंशियल क्राइसिस थाइलैंड से शुरू हुई थी

रिपोर्ट कहती है कि एशियन फाइनेंशियल क्राइसिस 1997-98 में थाइलैंड से शुरू हुई थी जिसे एक असेट बबल के रूप में देखा गया था। थाईलैंड में रियल इस्टेट और इंफ्रा में एशियन क्राइसिस से पहले भारी निवेश देखा गया था। उसी समय यू.एस फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में वृद्धि करनी शुरू कर दी ताकि मुद्रास्फीति पर काबू पाया जाए। इससे कम निर्यात हुआ और विदेशी निवेश कम हुआ।

थाइलैंड के असेट बबल ने प्रॉपर्टी बाजार को ध्वस्त कर दिया

रिपोर्ट कहती है कि थाईलैंड के असेट बबल ने देश के प्रॉपर्टी बाजार को ध्वस्त कर दिया और प्रॉपर्टी डेवलपर्स डिफॉल्ट हो गए। इससे यह साबित हुआ कि सफल करेंसी को बाद में डीवैल्यूड करना पड़ा। इसकी वजह से मलेशिया की करेंसी रिंगिट, इंडोनेशिया की करेंसी रुपिहा को भी डीवैल्यूड करना पड़ा। हालांकि हम पिछले आंकड़ों को देखें तो इन देशों ने बहुत ही बेहतर तरीके से ग्रोथ दर्ज की है।

थाईलैंड ने क्राइसिस से पहले 7 प्रतिशत की दर से तीन साल तक वृद्धि की थी। इंडोनेशिया ने 8 और कोरिया ने 9 जबकि मलेशिया ने 10 प्रतिशत की दर से इसी अवधि में वृद्धि की थी।