आरोग्य सेतु ऐप के डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं अधिकांश भारतीय, डाटा बेचे जाने और गलत इस्तेमाल की आशंका जताई

  • कोरोना संक्रमितों को ट्रेस करने के लिए सरकार ने अप्रैल में लॉन्च किया था आरोग्य सेतु
  • अब तक 12 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड, ऐप से अब तक 3500 हॉटस्पॉट की पहचान
  • सबसे अनसेफ ऐप्स में से एक है आरोग्य सेतु, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली है 2 स्टार रेटिंग

दैनिक भास्कर

Jun 22, 2020, 12:14 PM IST

नई दिल्ली. कोरोना संक्रमित लोगों को ट्रेस करने के मकसद से केंद्र सरकार ने अप्रैल में आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया था। शुरुआत में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए इसे अनिवार्य किया था। बाद में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी आरोग्य सेतु ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य कर दिया था। साथ ही इस ऐप को डाउनलोड ना करने पर 6 महीने का कारावास या 1000 रुपए का आर्थिक दंड लगाने का ऐलान किया था। लेकिन देश के अधिकांश लोग ऐप के डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। 

डाटा के इस्तेमाल पर संशय

आरोग्य सेतु ऐप के डाटा के इस्तेमाल को लेकर भी देश के लोग आशंकित हैं। दिल्ली के नजदीक नोएडा में रहने वाले 50 वर्षीय एक यूजर का कहना है, “मैं इस बात को लेकर निश्चित नहीं हूं कि सरकार मेरे डाटा का कैसे इस्तेमाल करेगी? यदि वो चाहे तो इस ऐप के जरिए मेरे ऊपर हमेशा नजर बनाए रख सकती है।” यह आशंका केवल राजीव घोष की नहीं है, बल्कि नोएडा के कई प्राइवेसी एक्टिविस्ट भी इस ऐप को डाउनलोड करने की अनिवार्यता पर सवाल उठाते हैं। इन एक्टिविस्ट्स का कहना है कि आरोग्य सेतु ऐप को अनिवार्य रूप से डाउनलोड करने का नियम सुप्रीम कोर्ट के 2017 के राइट टू प्राइवेसी को लेकर दिए गए फैसले का उल्लंघन करता है।

सरकार का दावा- डिलीट किया जा रहा है डाटा

केंद्र सरकार का दावा है कि आरोग्य सेतु ऐप यूजर्स का व्यक्तिगत और लोकेशन डाटा अंत में डिलीट किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इस ऐप के डाटा की गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए काफी काम किया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुताबिक, कोरोना की जांच कराने वाले व्यक्ति का डाटा 45 दिन, गैर संक्रमितों का डाटा 30 दिन और कोरोना संक्रमण का इलाज करवाने वालों का डाटा 60 दिन में हटा दिया जाता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि डाटा प्रोटेक्शन कानूनों के अभाव में लाखों लोगों की प्राइवेसी भंग हो सकती है। आलोचक इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि कोविड-19 के बाद सरकार इस व्यक्तिगत डाटा को प्राइवेट कंपनियों को बेच सकती है या फिर सर्विलांस के लिए इस्तेमाल कर सकती है।

अब तक 12 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड

आरोग्य सेतु ऐप के जून के पहले सप्ताह तक 12 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। अन्य देशों के कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप की तरह आरोग्य सेतु ऐप भी ब्लूटूथ और जीपीएस लोकेशन डाटा के आधार पर यूजर्स की गतिविधियों पर नजर रखता है। इस ऐप में यूजर का नाम, फोन नंबर, उम्र, जेंडर, प्रोफेशन, पिछले 30 दिनों में किसी अन्य देश की यात्रा जैसी जानकारी मांगी जाती है। इस ऐप में यूजर को सेल्फ असेसमेंट जैसी सुविधा दी जाती है। जो भी यूजर इस ऐप का इस्तेमाल करता है उसको एक यूनिक डिजिटल आईडी दी जाती है। यह ऐप जीपीएस के जरिए यूजर की प्रत्येक 15 मिनट बाद की लोकेशन रिकॉर्ड करता है। 

ब्लूटूथ के जरिए होता है आईडी का लेनदेन

जब दो आरोग्य सेतु ऐप यूजर संपर्क में आते हैं तो यह ऐप अपने-आप एक-दूसरे की आईडी का लेनदेन और समय-लोकेशन रिकॉर्ड कर लेते हैं। यदि दोनों में से कोई भी यूजर कोविड-19 संक्रमित होता है तो यह जानकारी फोन से सरकार के सर्वर पर अपलोड हो जाती है। बाद में इसी जानकारी को कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 

सबसे अनसेफ ऐप्स में से एक है आरोग्य सेतु

अमेरिका के मैसाच्युएट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने पिछले महीने 25 देशों के कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप्स का एनालिसिस किया था। इस एनालिसिस में एमआईटी ने आरोग्य सेतु ऐप को दो स्टार रेटिंग दी थी। जरूरत से ज्यादा डाटा मांगने के कारण आरोग्य सेतु ऐप को यह रेटिंग मिली थी। इस एनालिसिस में सिंगापुर के ऐप को 5 स्टार रेटिंग मिली थी, जबकि चीन के ऐप को कोई रेटिंग नहीं मिली। इस रेटिंग का आधार पर कहा जा सकता है कि आरोग्य सेतु सबसे अनसेफ ऐप्स में से एक है।

आरोग्य सेतु ऐप से 3500 हॉटस्पॉट की पहचान हुई

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, आरोग्य सेतु ऐप से 1 जून तक 2 लाख कोविड-19 रिस्क वाले लोगों की पहचान हुई है जबकि 3500 हॉटस्पॉट की पहचान की गई है। इंडिहुड के संस्थापक और सरकार के साथ इस ऐप पर काम करने वाले ललितेश कटरागड्डा के मुताबिक, इस ऐप का एफिसिएशी रेट 24 फीसदी रहा है। इसका मतलब यह है कि इस ऐप के कारण टेस्ट कराए गए 24 फीसदी लोग ही कोविड-19 संक्रमित मिले हैं। 

ब्लूटूथ-जीपीएस के कॉम्बिनेशन से गलत नतीजे संभव

आईआईटी दिल्ली में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग के प्रोफेसर सुभाशिष बनर्जी का कहना है कि ब्लूटूथ और जीपीएस के कॉम्बिनेशन के कारण गलत पॉजिटिव और गलत नेगेटिव केस की संख्या ज्यादा हो सकती है। उदाहरण के लिए, इंडोर लोकेशन पर जीपीएस सामान्य तौर पर उपलब्ध नहीं रहता है और ब्लूटूथ खुले स्थानों पर रेडियो तरंगों के कारण ज्यादा रिस्क का संकेत दे सकता है। जबकि वहां पर कोरोनावायरस नहीं हो सकता है।